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बीते दस सालों में दिल्ली की हवा ने वह मुकाम हासिल कर लिया है, जिसकी चर्चा अब सिर्फ राष्ट्रीय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी होती है। सोचने वाली बात यह है कि जिस देश की राजधानी में साँस लेना ही मुश्किल हो जाए, वहाँ प्रशासन की प्राथमिकताएँ क्या हैं? मतलब तो उन साधारण लोगों को है जो रोज सुबह पैसे कमाने के लिए निकलते हैं, ताकि वे कर चुका सकें और बदले में उन्हें जहरीली हवा मिले।
I Written by Aryan Ray I
दिल्ली की हवा ‘प्राणवायु’ नहीं, बल्कि ‘प्राणघातक’ बन चुकी है। सर्दियाँ आते ही वातावरण ‘गैस चैंबर’ में बदल जाता है, और प्रशासनिक तंत्र (चाहे वह कोई भी हो) इसे देखता रहता है कभी कानून बनाता है, कभी उसे भूल जाता है। यह आलेख व्यंग्य है, लेकिन इसके पीछे का दर्द बहुत गहरा है।
1. दिल्ली प्रशासन: ‘सांसें थमने’ का दस साल का ‘सफल’ प्रयोग
पिछले एक दशक में जितनी बार प्रदूषण पर ‘वॉर’ घोषित हुई, उतनी बार दिल्ली वालों ने साँस लेने की ‘वॉर’ हारी। जिसमें न जाने कितने लोग मारे गए, लेकिन आधिकारिक आँकड़ा मौजूद नहीं, क्योंकि प्रदूषण को सीधे मौत का कारण मानने से प्रशासनिक तंत्र बचता है।
· 2015: ‘ऑड-ईवन’ योजना लागू हुई: नंबर प्लेट के हिसाब से गाड़ियाँ चलीं, लेकिन लोगों ने दूसरी गाड़ी से ऑफिस जाना सीख लिया।
· 2019: ‘त्योहारों के बाद प्रदूषण’ एक ऐसी समस्या है जो पूरी दुनिया में कहीं नहीं। त्योहारों के समय ही अदालतें और प्रशासन सक्रिय होते हैं, और जब कोई उपाय सोचा जाता है, तब भी प्रदूषण वही का वही रहता है।
· 2020-21: ‘कोरोना लॉकडाउन’ में हवा साफ हुई, तो इसे ‘उपलब्धि’ बताया गया, मानो लॉकडाउन कोई नीतिगत प्रयोग था। फिर जैसे ही खुला, प्रदूषण फिर लौट आया।
· 2022: ‘ग्रीन वॉर रूम’ बनाया गया, जहाँ बैठकर अधिकारी चार्ट देखते हैं कि आज कितने पीपीएम में साँस लेना खतरनाक है।
· 2024 तक: हर साल नवंबर में ‘प्रदूषण इमरजेंसी’ घोषित होती है, लेकिन यह ‘इमरजेंसी’ प्रेस नोट से आगे नहीं बढ़ती।
2. फैक्ट्रियाँ: ‘आर्थिक विकास’ के नाम पर ‘फेफड़ों का क्षय’
दिल्ली-एनसीआर में फैक्ट्रियाँ धुआँ उगलने में किसी से पीछे नहीं।
· बवाना, नरेला, मुंडका: अवैध उद्योग कानूनी दस्तावेज़ों से ज्यादा धुआँ उगलते हैं। प्रशासन की आँखें मान बैठी हैं कि प्राकृतिक वातावरण ऐसा ही होता है। क्योंकि साफ वातावरण कैसा होता हे यह तो हमें पता ही नहीं।
· पावर प्लांट: आसपास के थर्मल प्लांट सालभर कोयले की होली खेलते हैं। क्योंकि भारत मे आज भी 70% बिजली कोयले से आती हे। मतलब यह कि घर मे उजाला और शहर मे अधेरा।
· ईंट-भट्ठे: हजारों अवैध भट्ठे बंद करने के आदेश दिए गए, लेकिन ‘बंद’ का मतलब सरकारी फाइलों तक सीमित रहा।
· एनसीआर की फैक्ट्रियाँ: हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सीमा पर लगी फैक्ट्रियाँ प्रदूषण का ‘निर्यात’ करती हैं—बिना किसी शुल्क के। जिससे उत्तर प्रदेश सरकार को जान और माल दोनो का नुकसान होता है।
· कचरा जलाना: तीनों नगर निगम ‘स्वच्छता सर्वेक्षण’ के लिए कैमरे लगाते हैं, लेकिन खुले में जलते कूड़े के ढेर सरकारी ‘लालटेन’ की तरह रोशन रहते हैं।
3. दिल्ली की गाड़ियाँ: ‘पराली से ज्यादा जहर’ भीतर ही भीतर
दिल्ली में गाड़ियों की संख्या ने इंसानों की संख्या को पीछे छोड़ दिया है।
· 1.4 करोड़ से अधिक रजिस्टर्ड वाहन: यानी हर परिवार के पास औसतन 2-3 गाड़ियाँ।
· 10 साल पुराने डीजल वाहन: बैन तो हुआ, लेकिन ‘बैन’ का मतलब यहाँ ‘रिश्वत देकर निकालो’ होता है।
· ट्रैफिक जाम: इतना लंबा जाम कि गाड़ियाँ खड़े-खड़े ज्यादा प्रदूषण फैलाती हैं, जितना चलकर फैलातीं।
· ईंधन की गुणवत्ता: BS-VI आ गया, लेकिन पुरानी गाड़ियाँ BS-III का धुआँ ‘विरासत’ की तरह संभाले बैठी हैं।
· इलेक्ट्रिक वाहन: EV पॉलिसी बनी, लेकिन चार्जिंग स्टेशन उतने ही कम हैं, जितने संसद में बिना मुकदमे के सांसद।
4. पराली: सालाना ‘धुआँ-ए-तक़दीर’ और राजनीति की ‘अगरबत्ती’
हर साल अक्टूबर-नवंबर में हरियाणा-पंजाब की पराली जलती है, और दिल्ली प्रशासन ‘बाहरी साजिश’ का राग अलापता है।
· पराली जलाने के आँकड़े: 2017 में 70,000 से अधिक घटनाएँ, 2023 में घटाकर 30,000 लाया गया, लेकिन AQI ‘बेहतर’ न होकर ‘बेहद खराब’ ही रहा। क्योंकि पराली एक कारण है, एकमात्र नहीं।
· राजनीतिक पासिंग द बक: दिल्ली कहती है—‘पंजाब-हरियाणा कर रहे हैं’, पंजाब-हरियाणा कहते हैं—‘हमने कम कर दिया’, और दिल्ली वाले पूछते हैं—‘हमें कौन बचाएगा?’
· पराली का योगदान: वैज्ञानिक रिपोर्ट बताती हैं कि अक्टूबर-नवंबर में दिल्ली के प्रदूषण में पराली का हिस्सा 30-40% तक पहुँच जाता है, बाकी 60% दिल्ली-एनसीआर का अपना ‘स्वदेशी’ प्रदूषण होता है।
· जिम्मेदारी से इनकार: यह ‘टॉस-द-बॉल’ का खेल इतना लंबा चल चुका है कि अब दिल्ली वालों को ‘साँस लेने का लाइसेंस’ माँगना पड़ रहा है।
निष्कर्ष: ‘इंद्रप्रस्थ की हवा’ अब ‘इंद्रप्रस्थ की मुसीबत’
दस साल में दिल्ली की हवा ने ‘ज़हरीली फिल्म’ का सीक्वल हर साल रिलीज़ किया है। ‘ऑड-ईवन’ से लेकर ‘वर्क फ्रॉम होम’ तक हर हथकंडा आजमाया गया, लेकिन असली हथकंडा यह है कि जनता को ‘मरने का अभ्यास’ करा दिया गया है। अगर पैसे हैं तो एयर प्यूरीफायर लगाकर स्वच्छ हवा का आनंद लें, नहीं तो बेहतर हवा में साँस लेने का कोई अधिकार नहीं। अस्पतालों में साँस के मरीज़ों की लाइनें लगती हैं, ताकि कंपनियों द्वारा बनाई गई हवा को एक खास प्रक्रिया से गुज़ार कर दिया जाए। इस हवा के लिए पैसे लगते हैं, जबकि प्रकृति ने मुफ्त दिया था। स्कूल बंद कराए जाते हैं ताकि बच्चे ‘हवा से’ बच सकें। गजब है प्रशासन और गजब हैं उनकी नीतियाँ।
जब तक फैक्ट्रियाँ ‘आर्थिक विकास’ के नाम पर जहर उगलती रहेंगी, गाड़ियाँ ‘स्टेटस सिंबल’ बनकर सड़कों पर लोट-पोट होती रहेंगी, और पराली ‘राजनीति का ईंधन’ बनकर जलती रहेगी, तब तक दिल्ली वाले ‘ऑक्सीजन पार्लर’ में जाकर साँस लेना सीखेंगे, और प्रशासन ‘प्रदूषण पर काबू पाने’ के रिपोर्ट कार्ड बाँटता रहेगा। AQI मीटर के सामने पानी का छिड़काव होता रहेगा, और कोई न कोई नेता AQI को ‘AIQ’ बोलता रहेगा। अंत में जनता जहरीली हवा में साँस लेकर अपने-अपने ईश्वर का नाम लेती रहेगी।
“हँसी आती है, पर दम घुटता है। शायद यही ‘इंद्रप्रस्थ की हवा’ का असली मज़ाक है।”






