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गर्म हवा, ठंडा मज़ाक विकासशील भारत का जलवायु-चित्र

अगर बीते बीस सालों मे हम जलवायु परिवर्तन पर हुई मौसम-चर्चा का कैप्शन देना हो, तो लिखेंगे “पसीना बह रहा है, पर हम आगे बढ़ रहे हैं।” हमारी प्रगति का पारा जितना चढ़ता है, हम उतना ही एसी की ठंडक में सोचते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग सिर्फ़ विदेशी दस्तावेज़ों की भाषा है, जबकी यह भाषा हर देश की अपनी भाषा है। बाहर सड़क तवे-सी तप रही है, और हम अंदर ‘स्मार्ट सिटी’ का विज्ञापन देख कर ठंडी कुल्फ़ी का आनंद ले रहे हैं। पिछले बीस सालों में जलवायु परिवर्तन ने जो करवट ली है, वह अब सुबह की चाय से लेकर रात की नींद तक में महसूस हो रही है, बस हम शब्दों के कंबल ओढ़कर ख़ुद को बहलाए जा रहे हैं।

2004 से 2024 तक, भारत ने विकास के ग्राफ़ को तो एक सीधी रेखा में चढ़ाया, लेकिन उसी ग्राफ़ के समानांतर जंगलों की ज़मीन, साँस लेने लायक हवा और भूजल की सतह नीचे गिरती गई। विश्व बैंक के अनुसार, भारत औसत तापमान में बीती सदी की तुलना में 0.7 डिग्री सेल्सियस ऊपर बढ़ चुका है, लेकिन पिछले दो दशकों में रफ़्तार चिंताजनक है। भारतीय मौसम विभाग के आँकड़े बताते हैं कि 1901 के बाद के 15 सबसे गर्म सालों में से 11 साल सिर्फ़ 2009 से 2023 के बीच आए। जैसे गर्मी हमारी जीडीपी की तरह सुर्खियाँ बटोर रही थी। अगर बात 2026 की करे तो फ्रिज के ठंडे होने से पहले ही शहर के शहर तपने लगे, 2026 ने सर्दियों के ख़त्म होने और गर्मियों के मौसम शुरु होने के बीच के दिनों को गायब सा कर दिया है।

विकास की इस रेसिपी में सबसे अहम मसाला है पेड़ों की लकड़ी। हमने तय किया कि कंक्रीट के जंगल ज़्यादा फ़ायदेमंद हैं, क्योंकि असली जंगल तो सिर्फ़ ऑक्सीजन देते हैं, रोज़गार नहीं। ग्लोबल फ़ॉरेस्ट वॉच के मुताबिक, 2001 से 2022 के बीच भारत 2.33 मिलियन हैक्टेयर वृक्ष आवरण खो चुका है, जो शहरों के विस्तार, माइनिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर की बलिवेदी पर चढ़ा। अरे कॉलोनी का मामला याद कीजिए  मुंबई के फेफड़ों को मेट्रो शेड के लिए काटा गया, ताकि एसी में बैठे यात्री ‘ग्रीन मुंबई’ के स्टीकर वाली ट्रेन से गुज़रें। सचमुच दूरदर्शिता का शानदार मॉडल: पहले पेड़ काटकर गर्मी बढ़ाओ, फिर उसी गर्मी से बचने के लिए और ठंडी मेट्रो दौड़ाओ।

भारत में विकास का दूसरा इंजन है कोयला और उद्योग। हम दुनिया के दूसरे सबसे बड़े कोयला उपभोक्ता हैं और गर्व से कहते हैं  “अभी तो और खदानें खोलेंगे।” देश की 55 प्रतिशत बिजली आज भी कोयले से आती है, और सरकार 2070 तक नेट-ज़ीरो के सपने दिखाते हुए हर साल नए कोयला ब्लॉक्स की नीलामी कर रही है। उद्योगों की चिमनियाँ इतनी ईमानदार हैं कि पूरा प्रदूषण खुले आसमान में बाँट देती हैं, कोई छिपाव नहीं। दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों के एयर क्वालिटी इंडेक्स का ऐप खोलिए, तो अमेरिकी दूतावास के आँकड़े एक्सरसाइज़ के लिए खतरनाक बता रहे होंगे, और हम सलामत रहने के लिए एयर प्यूरीफ़ायर का बाज़ार खड़ा कर रहे हैं। वाह, यानी प्रदूषण भी इकॉनमी चला रहा है। मनुष्य ने विकास के नाम पर धरती की कायापालत कर दी, हमारे लालाच ने धरती को खोद खोद के अधमरा कर दिया। और हम यही पर नहीं रुके, अब हम समुद्र के अंदर भी खोदने जा रहे है। मतलब यह कि धरती का एक भी जींव नहीं बचना चाहिए, फिर चाहे वो समुद्र के अंदर ही क्यो ना हो।

आम आदमी का हाल पूछिए तो फ़सल के साथ हाड़ काँप जाते हैं। 2022 में मार्च-अप्रैल की रिकॉर्डतोड़ लू ने गेहूँ की पैदावार को ऐसे मुरझाया कि सरकार को निर्यात रोकना पड़ा। उसी साल दिल्ली का तापमान 49.2 डिग्री और फलोदी का 51 डिग्री सेल्सियस पार जा चुका था। किसान बेबस खेतों में खड़ा सोचता रहा कि विकास की गर्मी पक्की फसल को भी चिट्ठी लिख जाती है। शहरी ग़रीबों के लिए तो गर्मी टिन की छत के नीचे मौत का पैग़ाम बनकर आती है  2023 की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हीटवेव से सालाना 1100 से ज़्यादा मौतें हो रही हैं, और यह आँकड़ा अंडररिपोर्टेड माना जाता है। सबको न्याय चाहिए, मौसम भी ग़रीब-अमीर की रेखा खींच रहा है।

अगर भविष्य की बात करें, तो आईपीसीसी की रिपोर्ट साफ कहती है कि हिमालय के ग्लेशियर इसी सदी में एक तिहाई तक पिघल सकते हैं। गंगा और सिंधु के मैदानों को पानी देने वाले ये हिमखंड जब तक बर्फ़ रहेंगे, तब तक हम बाँध बना सकते हैं; फिर नदियाँ पहले जानलेवा बाढ़ लाएँगी, बाद में सूख जाएँगी। मुंबई, कोलकाता और चेन्नई के बड़े हिस्से 2050 तक समुद्र में समा सकते हैं, जैसे कि क्लाइमेट सेंट्रल के नक्शे अंगुली उठाकर बता रहे हैं। हम बंगाल की खाड़ी में ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर लाखों पेड़ काटकर ट्रांसशिपमेंट हब बसाने में जुटे हैं, जहाँ दुर्लभ कोरल और आदिवासी समुदाय दोनों ख़तरे में हैं। दरअसल हम विकास के नाम पर प्रकृति की ‘क्लोज़िंग सेल’ चला रहे हैं, जिसमें भविष्य डिस्काउंट पर मिल रहा है।

एक नज़र दुनिया पर

जब हम भारत में पसीना पोंछ रहे हैं, दुनिया का पारा भी हदें तोड़ रहा है। 2023 दुनिया का सबसे गर्म साल रिकॉर्ड हुआ, जहाँ औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक काल से 1.45 डिग्री सेल्सियस ऊपर पहुँच गया। कनाडा के जंगलों ने इतनी आग झेली कि पूरे यूरोप का आसमान धुँधला गया, लीबिया में बाढ़ ने एक शहर ही बहा दिया, और अमेज़न के वर्षावन सूखे से कराह रहे हैं। पेरिस समझौते की 1.5 डिग्री की सीमा अब काग़ज़ी उम्मीद बनकर रह गई है, और अमीर देश जीवाश्म ईंधन में इतना पैसा झोंक रहे हैं जैसे कोई दूसरा ग्रह बैकअप के लिए रखा हो। दुनिया के 1 प्रतिशत अमीर लोग 66 प्रतिशत गरीब आबादी से कई गुना अधिक कार्बन उत्सर्जन कर रहे हैं, और यही असमानता जलवायु का असली ‘नेरेटिव’ है।

सरकार की भूमिका पर आएँ तो, हमारे पास सुंदर वादों का गुलदस्ता है 2030 तक 500 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा, नेट-ज़ीरो 2070, और एक के बाद एक क्लाइमेट समिट में ‘वैश्विक नेतृत्व’ के दावे। पर ज़मीन पर हाल यह है कि सिंगरौली जैसे कोयला बेल्ट में विस्थापन, प्रदूषण और ज़हरीला पानी आम बात है। केंद्र सरकार ने 2023 में 133 कोयला खदानों की नीलामी की, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा के लक्ष्य साल-दर-साल खिसक रहे हैं। स्थानीय प्रशासन कंक्रीट के पुल और हाईवे के रिबन काटने में व्यस्त है, जबकि बारिश का पानी नालों में बहकर बेकार जा रहा है। क़ानून तो बहुत बने वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग, एनजीटी के निर्देश लेकिन उल्लंघन की सज़ा इतनी छोटी है कि उद्योगपति वकील को रिटेनर देकर चिमनी को सलाम ठोकता है।

निष्कर्ष: अब भी रास्ता बाक़ी है, बस शुरूआत ख़ुद से हो

सारी कड़वाहट के बावजूद, सच यही है कि हम न तो पूरी तरह बर्बाद हो चुके हैं, न ही इतने मजबूर कि हथियार डाल दें। जलवायु को अब भी बचाया जा सकता है, बशर्ते हम ‘विकास’ की परिभाषा बदलें। पहला काम  अपने रोज़मर्रा के फ़ैसलों को थोड़ा कम ‘आराम’ और थोड़ी ज़्यादा ‘ज़िम्मेदारी’ की तरफ़ मोड़ें। मतलब यह नहीं कि एसी छोड़ दें, लेकिन हर कमरे को 16 डिग्री पर ठंडा करके रजाई ओढ़ना बंद करें। छोटे शहरों में साइकिल और पैदल चलने की संस्कृति को ‘गरीबी’ न समझें, बल्कि हेल्थ और प्रकृति दोनों के लिए निवेश मानें। घर में सोलर पैनल, रेन वॉटर हार्वेस्टिंग और कम पानी वाले पेड़ लगाना शान नहीं, समझदारी है। सोसायटी का एक हिस्सा खाली ज़मीन पर किचन गार्डन उगाए तो तापमान की मार थोड़ी कम हो सकती है। जो लोग भगवान मे मानते है वह यह तो सोचे कि यह आपके भगवान की दी हुई अमानत है, और जो भगवान मे नहीं मानते वह यह मान ले कि हमारे जीने के लिए यह एक मात्र अमानत है।

दूसरा बड़ा क़दम  पेड़ों को वापस लाना। हर कटे पेड़ के बदले दस लगाने का सरकारी नारा है, लेकिन नागरिकों को इसे सिर्फ़ सरकार पर मत छोड़िए। स्कूल, कॉलेज और मोहल्लों में मियावाकी जंगल बनाना अब युवाओं का पसंदीदा शगल बन सकता है। दिल्ली के तिलपत और चेन्नई के अड्यार जैसे इलाकों ने दिखाया है कि थोड़ी-सी ज़मीन पर भी शहरी जंगल उगाए जा सकते हैं। ये जंगल पक्षियों को वापस बुला रहे हैं, तापमान कम कर रहे हैं और सबसे बड़ी बात, बच्चों को सिखा रहे हैं कि ऑक्सीजन कोई प्लांट से नहीं, पत्तों से आती है। सरकार को चाहिए कि निर्माण की मंज़ूरी देते वक़्त हर प्रोजेक्ट में 30 प्रतिशत हरियाली अनिवार्य करे और उसकी पांच साल तक जवाबदेही तय करे।

तीसरा उपाय है ऊर्जा का लोकतंत्रीकरण। रूफटॉप सोलर को आसान सब्सिडी और बिजली बेचने का अधिकार मिले, तो करोड़ों घर अपनी बिजली ख़ुद पैदा करने लगेंगे। बिहार और राजस्थान के गाँव पहले ही सोलर वाटर पंप से सिंचाई कर रहे हैं, बस यह मॉडल राष्ट्रीय पैमाने पर स्केल करना बाक़ी है। साथ ही, कोयले पर निर्भरता को ईमानदारी से कम करने के लिए समय-सीमा बाँधनी होगी, वरना 2070 वाला नेट-ज़ीरो आने वाली पीढ़ी को बुज़ुर्गों की कहानी लगेगा। स्थानीय निकायों को प्लास्टिक कचरे, निर्माण मलबे और जलस्रोतों के संरक्षण में सख्त होना पड़ेगा, क्योंकि ज़मीन का हर टुकड़ा अब क्लाइमेट इंश्योरेंस माँग रहा है।

अंत में, सबसे असरदार हथियार है सोच में बदलाव। जब हम कोई भी सामान खरीदें, कोई बटन दबाएँ, कोई वोट डालें, तो एक पल रुककर पूछें  “क्या यह काम मेरे बच्चों की हवा, पानी और छाँव की कीमत पर तो नहीं हो रहा?” अगर यह सवाल दस करोड़ लोगों के दिमाग़ में गूँजने लगे, तो सियासत से लेकर बाज़ार तक सबकी चाल बदल जाएगी। प्रकृति को बचाने के लिए बड़े आंदोलनों की नहीं, छोटी-छोटी साझा आदतों की ज़रूरत है। बीस साल की गर्मी ने जो सबक सिखाया है, वह यही है  “जल, जंगल और ज़मीन को बचाने का एकमात्र रास्ता है, उन्हें भोगने की बजाय संग चलना।”